Tuesday, July 21, 2009
कल सुबह सूर्य ग्रहण है। पूर्ण सूर्य ग्रहण। खग्रास सूर्य ग्रहण। खास चश्मा पहनें और यह अद्भुत खगोलीय घटना जरूर देखें। तब तक गुलजार साहब की यह नज्म पर पढ़ें-
'सूर्य ग्रहण'
और फिर एक अचानक पूरा हाथ पकड़ लेता था,
मुट्ठी में भर लेता था।
Monday, June 8, 2009
... तो पशु-पक्षियों से कुछ सीखते क्यों नहीं
घुघूती बासूती ने एक अच्छी जानकारी वाली पोस्ट लिखी है, सौराष्ट्र के किसान पक्षियों के लिए ज्वार बोते हैं, फलों के वृक्षों पर फल छोड़ते हैं। यह पोस्ट ऐसे वक्त में आई जब चारों ओर पर्यावरण को बचाने, जीव जंतुओं की हिफाजत की चिंता की जा रही है। यह पोस्ट इस मायने में अहम है। यह पोस्ट वास्तव में प्रेरणा देने वाली है।
दूसरो कामों में लगे होने की वजह से मैं आजकल ब्लॉग की दुनिया में कम ही विचरता हूँ। लेकिन घुघूती जी की इस पोस्ट पर आई एक- दो टिप्पिणी देखकर लगा कि हिन्दी ब्लॉगिंग में अब भी बहुत कुछ नहीं बदला है। कुछ लोग पहले की ही तरह आज भी लगातार उकसाने में लगे हैं। हालाँकि पहले वे जबरदस्त मुँह की खा चुके हैं। उकसाने का उनका अंदाज आज भी वही पुराना है। पशु- पक्षियों पर टिप्पणी करते-करते वे गुजरात और गुजराती अस्मिता को बीच में घसीट लाए। आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि इनकी मंशा क्या थी। मैंने घुघूती जी की इस पोस्ट पर जो टिप्पणी की है, वो यहाँ पेश कर रहा हूँ। घुघूती जी की पोस्ट पर ऐसी टिप्पणी कर कुछ लोग चूँकि उकसाने पर आ ही गए हैं तो मेरे भी चंद सवाल हैं।
-ये कैसे मुमकिन हैं कि पशु-पक्षियों के लिए तो अगाध प्रेम उमड़े और इनसानों को गाजर मूली की तरह कतर दिया जाए। और उस कतरने को जायज ठहराने में हाथ जरा भी न काँपे।
... और जहाँ तक उन्माद की बात है तो उन्माद क्षण भर का होता है। ये उन्माद तो सात साल से बरकरार है। और उसको सही ठहराया जा रहा है। आँख में जरा भी पानी नहीं।
अरे कुछ नहीं तो जरा पशु-पक्षियों से ही सीख ले लें हुजूर। जो बिना नफरत के बोल बोले, किसी की हत्या किए, किसी माँ का पेट फाड़े- कभी इस मुंडेर पर कभी उस मुंडेर पर डेरा जमा लेते हैं। कभी किसी मंदिर पर तो कभी किसी मस्जिद पर बेफिक्र जा बैठते हैं।
क्या गुजरात के इंसानों को यह आजादी है... जिन लोगों को गुजराती अस्मिता की इतनी फिक्र है, उन्होंने अहमदाबाद में 'बॉर्डर' क्यों बना रखा है।
पशु-पक्षियों से प्रेम करो इनसान से...। क्या पशु- पक्षियों से प्रेम करने से पहले कभी पूछा है कि उनका मजहब क्या है। किस का गंडा पहना है। (इस पोस्ट के ऊपर दाहिने में एक स्लाइड शो है... इनसानों को चाहिए कुछ इनसे जरूर सीखें।)
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Monday, April 13, 2009
तीस साल बाद स्याह यादें
(अभी सन 84 के दंगों को लेकर काफी हंगामा बरपा था। जिस पार्टी को जो आसान और सुविधाजनक लगा, उसने 84 के दंगा और पीडि़तों का अपने तरीके से इस्तेमाल किया। लेकिन इस मुल्क ने सत्तर और अस्सी के दशक में कुछ और भयानक दंगे देखे हैं, उन्हें कोई याद नहीं रखना चाहता। उसके लिए कोई हो हल्ला भी नहीं मचता। ऐसा ही एक दंगा था, जमशेदपुर का। मैंने भी दंगा पीडि़तों को पहली बार इसी दंगे के जरिए जाना था। समाचार वेबसाइट टूसर्किल्स डॉट नेट के सम्पादक काशिफ उल हुदा उस वक्त पाँच साल के थे और दंगे में बाल-बाल बच गए थे। उस दंगे के तीस साल बाद यह बच्चा अपने बचपन के उन काली स्याह यादों को ताजा कर रहा है। इसलिए नहीं कि आप सियापा करें। इसलिए कि ऐसी यादें कितनी खौफनाक होती हैं और उनका असर ताउम्र होता है। तो क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को भी ऐसी ही खौफनाक यादें देकर जाना चाहते हैं। यह टिप्पणी मूल रूप में अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे हिन्दी में सिटिजन न्यूज सर्विस ने तैयार किया है। मैंने उस हिन्दी अनुवाद में थोड़ा संशोधन, थोड़ा सम्पादन किया है।-नासिरूद्दीन)
1979 के जमशेदपुर के दंगों की यादकाशिफ-उल-हुदा
1979 के इसी अप्रैल महीने में बिहार के जमशेदपुर में हिन्दू-मुस्लिम फसाद हुए थे। इस फसाद में 108 लोगों की जानें गयीं थीं. यह तादाद 114 भी हो सकती थी, लेकिन खुशकिस्मती से मेरा खानदान किसी तरह बच गया. शायद इसलिए हम आज 30 साल बाद उस दिल दहला देने वाली घटना को बयान करने के लिए जिंदा हैं.
मैं पाँच साल का था जब यह दर्दनाक हादसा हुआ। लेकिन इस हादसे की याद मेरे दिलो-दिमाग में गहरे पैठी है। मेरे बचपन की चंद यादों में एक अहम याद है. आज इस हादसे की डरवानी तसवीर मेरी आँख के सामने घूम रही है.
11 अप्रैल 1979 के दिन सुबह से ही फिजा में कुछ अनहोनी की बू आ रही थी. पता नहीं कैसे, लेकिन मेरी अम्मा ने इस खराब हवा को सूँघ लिया। रामनवमी की सुबह वह अपने भाई और मेरी दो छोटी बहनों के साथ पास के मुसलमान बहुल इलाके, गोलमुरी में चली गईं. लेकिन मेरे अब्बा के खयालात काफी अलग थे। उन्हें पूरा यकीन था कि कुछ नहीं होगा. उन्होंने कॉलोनी के हिन्दुओं और मुसलमानों को मिलाकर एक कमेटी बनाई थी। उन्हें भरोसा था कि बलवाई चाहे हिन्दू हों या मुसलमान, कमेटी ढाल का काम करेगी। हिन्दू-मुसलमान सब मिलकर रहेंगे।
अब्बा के साथ मैं और मेरे बड़े भाई रुक गए। अम्मा और बहनें सुबह ही गोलमुरी जा चुकी थीं. लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरने लगा, हमने देखा वैसे-वैसे बाहर लोगों की भीड़ बढ़ रही थी. भैया घबराने लगे, कहीं कुछ हो गया तो। दोपहर के खाने के वक्त तक हमने अब्बा को किसी तरह मना लिया कि वह हम दोनों को अम्मा के पास गोलमुरी छोड़ आएँ.
जब हम लोग गोलमुरी में अपने रिश्तेदार कमाल साहब के घर खाना खा रहे थे, तब ही यकायक लोगों के चिल्लाने की आवाजें आयीं... यानी बलवा शुरू हो गया.
यह देखने के लिए की क्या हो रहा है, हम लोग भाग कर बाहर तरफ आए. देखा कि कुछ ही दूरी पर जबरदस्त धुआँ उठ रहा था. इसके बाद की मेरी यादें, टुकड़ों- टुकड़ों में ही है. मुझे याद है कि हम जिस घर में रह रहे थे, वहाँ पर सिर्फ़ औरतें और बच्चे थे. मुझे यह याद है कि मैं वहाँ खाना नहीं खाना चाहता था क्योंकि वह कच्चा ही रह जाता था. मैं इतनी छोटी सी उम्र में रिफ्यूजी बन गया था. कच्ची उम्र में ही रिफ्यूजी होने का तजुर्बा. मुझे आज भी याद है कि रात के अंधेरे में जब मैं छत पर जाता, तो मुझे चारों ओर आग की लपटें दिखाई देतीं मानो पूरा शहर ही जल रहा हो. मुझे यह भी याद है कि कोई मुझे छत पर जाने के लिए डाँट रहा था. क्योंकि छत पर मैं आसानी से किसी बलवाई की गोली का निशाना बन सकता था. मुझे यह भी याद है कि मैं अपने अब्बा से बहुत दिनों तक कम ही मिल पाया था. मैं बहुत सहमा-सहमा रहता था.
कई साल बाद मुझे पता चला जब हिन्दू-मुसलमानों की संयुक्त कमेटी में शामिल ज्यादातर हिन्दू इलाका छोड़ कर जा रहे थे तो जमशेदपुर के टिनप्लेट इलाके में हमारा घर ही आस पड़ोस के मुसलमानों का शरण गाह बना हुआ था।
उस दिन मेरे अब्बा कुछ जरूरी सामान देने के लिए गोलमुरी आए। जब तक वापस जाते तब तक कर्फ्यू लग गया था. वह वापस नहीं जा सके. इस बीच टिनप्लेट इलाके में रह रहे मुसलमानों ने देखा कि वह हर ओर से घिर रहे हैं. वे टिनप्लेट फैक्ट्री में मदद माँगने पहुँचे. लेकिन यह क्या... वहाँ पर रोज साथ काम करने वाले उनके साथियों ने ही उन्हें बर्बरतापूर्वक मार डाला. मेरे अब्बा सिर्फ़ इसलिए आज हमारे बीच हैं क्योंकि कर्फ्यू लग जाने की वजह से वह गोलमुरी से टिनप्लेट वापस नहीं जा सके थे.
हालाँकि हमारी जान बच गई थी लेकिन हमारे घर का सारा सामान लुट गया था. बाकि लोगों का सब सामान जला कर राख कर दिया गया था. महीनों बाद हम सब एक नए इलाके में रहने के लिए गए. इसका नाम था अग्रिको कॉलोनी. यह कॉलोनी जो मुसलमानों की एक और बस्ती भालूबासा के सामने थी. कमरों में नई नई पुताई हुई थी पर यह पुताई भी उस वहशियाना आग और लूट के दाग नहीं छुपा पा रही थी. हमें यह तो नहीं पता था कि इन घरों में किसी की हत्या हुई थी या नहीं पर तबाह के निशाँ साफ़ दिख रहे थे.
अगले कई सालों तक मुझे कई लोगों से इस दंगे की दिल-दहला देने वाली आप बीती सुनने को मिली. मुझे एक महिला की याद है जिसके शरीर पर जलने के निशाँ थे. यह महिला उस एम्बुलेंस में सवार थी, जिसे दंगाइयों ने आग के हवाले कर दिया था. दंगाई यह सोच कर आगे बढ़ गए थे कि इसमें सवार सभी लोग मारे गए हैं. हर रोज स्कूल जाते वक्त हम पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ी इस जली एम्बुलेंस को देखते थे.
मारे गए 108 लोगों में से 79 मुस्लमान और 25 हिन्दू थे. बड़ी तादाद में लोग जख्मी हुए थे और अनेकों ऐसे थे जिनका सब कुछ खत्म गया था.
जमशेदपुर, उद्योगों की नगरी है. यहाँ हर ओर टाटा की फैक्ट्री है. इस शहर में रहने वाले ज्यादातर लोग इन फैक्ट्रियों में ही काम करते हैं. पूरे शहर का जिम्मा कम्पनी पर है. कम्पनी के क्वार्टर में हर मजहब के लोग रहते आए हैं.
यह समझ से परे है कि ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण और बर्बर बलवा उस शहर में हुआ जहाँ हर जाति-धर्म- भाषा के लोग मिल्लत के साथ रहते थे. यहाँ रह रहे ज्यादातर लोग या तो अविभाजित बिहार के रहने वाले थे या देश के किसी और कोने से. सभी कंपनी में काम करने वाले मध्यवर्ग के लोग थे और अपने परिवार के लालन पालन में लगे थे. ऐसा भी नहीं है कि जमशेदपुर के दंगों में सिर्फ़ मुसलमान ही मरे थे, बल्कि हिन्दू भी मारे गए थे. तब आख़िर इन दंगों का फायदा किसको मिला था?
तीस साल पहले जिस आदमी ने उस दिन पूरे जमशेदपुर को अपने कब्जे में ले लिया था, वह था स्थानीय विधायक दीनानाथ पाण्डेय. इस दंगे के बाद पाण्डेय दो बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर भी बिहार विधानसभा पहुँचा. भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में वह 1990 तक चुनाव जीतता रहा. उसकी सीट भारतीय जनता पार्टी के लिए 'सुरक्षित' सीट बन गई. विधानसभा के पिछले दो चुनाव में, भारतीय जनता पार्टी इस सीट से 50 प्रतिशत से भी अधिक वोट से जीती है.
अब लोकसभा चुनाव हो रहे हैं. जब हम यह टिप्पणी करते हैं कि राजनीति में गुंडे या अपराधी पृष्ठभूमि के लोग आ गए हैं, तो हम यह भूल जाते हैं कि इसके लिए भी हम लोग ही जिम्मेदार हैं. दीनानाथ पाण्डेय जैसे लोग का, जिनपर सामूहिक हत्या का आरोप है, राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए. जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को चुनाव लड़ने से रोक कर कांग्रेस ने सराहनीय काम किया है। लेकिन यह वही पार्टी है जिसके शासन में आंध्र प्रदेश में आतंकी होने के आरोप में मुसलमान युवाओं को गैर कानूनी तरीकों से गिरफ्तार किया गया। यही नहीं पुलिस ने उनसे जुर्म कबूलवाने के लिए टार्चर किया। महीनों बाद भी जब पुलिस अपना आरोप साबित न कर सकी तो हाल ही में ये बेगुनाह नौजवान रिहा कर दिए गए हैं। सत्ताधारी तब तक कोई भी बेहतर कदम नहीं उठाते हैं, जब तक लोग अपना आक्रोश जाहिर न करें और जन दबाव न बनाएँ. इसलिए नाइंसाफी के खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके जन दबाव बनाना जरूरी है।
अगर पार्टियों ने वक्त रहे सख्त कदम नहीं उठाए और अपराधियों को टिकट देना जारी रखा तो हम लोगों को कदम उठाना चाहिए। हम लोगों को ऐसे उम्मीदवारों को वोट नहीं देने का फैसला करना चाहिए जो नफरत फैलाते हैं और अपराधिक पृष्ठभूमि के हैं।
(लेखक समाचार वेबसाइट www.twocircles.net के संपादक हैं)
यहाँ भी नजर डालें-
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मशहूर पत्रकार एमजे अकबर ने अपनी पुस्तक Riot After Riot में जमशेदपुर दंगे के बारे में क्या लिखा है। यह पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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जमशेदपुर दंगे की जाँच रिपोर्ट रिपोर्ट के अंश
Jamshedpur, April 1979
Toll: 108 (Muslims: 79; Hindus: 25)
Probe: The Jitendra Narain Commission of Inquiry
In 1978, a Ram Navami akhara was established in Jamshedpur's tribal Dimna Basti. The mission noted: [This is, by itself, a significant development, indicative of some design, considering that the Adivasis, not being Hindus, did not perform Hindu religious worship...] Sonaram Manjhi, a tribal, sought permission to take out a Ram Navami procession through Road 14, which passed through a Muslim area. The local administration refused permission.
The controversy surfaced again the following year. RSS leader and MLA Dina Nath Pandey led the city's various akhara samitis in insisting upon taking the procession through Road 14. On April 7, pamphlets were distributed asking people to assemble near Road 14 at 11 am on April 11, and forcibly take out the procession. On April 10, the administration persuaded Muslim leaders to agree to the procession taking Road 14.
On April 11, the administration managed to get the procession to start early, and it passed Road 14 without incident. But Pandey suddenly arrived and stalled the marchers, warning that they wouldn't move until BK Trivedi, who had been arrested a few days earlier, was released from judicial custody.
By 11 - the time notified in the pamphlet - a huge crowd had gathered near Road 14. Most were armed. The procession then moved into the adjoining Muslim area. Some stone-throwing sparked off bloody rioting.
"The chain of events...provided the occasion for the anti-socials amongst the Muslims to assert themselves and assume the leadership of the community," opined the commission. On March 31 and April 1, the RSS divisional conference in Jamshedpur was addressed by the then chief Balasaheb Deoras.
The commission quoted Deoras extensively and said: "...the speech of Shri Balasaheb tended to encourage the Hindu extremists to be unyielding in the demands regarding Road 14. Secondly, his speech amounted to communal propaganda. Thirdly, the Shakhas and camps held during the conference presented a militant atmosphere to the Hindu public. In the circumstances, the commission cannot but hold the RSS responsible for creating a climate for the disturbances that took place on the 11th of April, 1979 and thereafter..."
The commission also believed that the akhara samitis in Jamshedpur were controlled by the local RSS leadership. (Various commissions have commented on the RSS's links with organisations which are floated for specific causes, and which have played dubious roles in communal riots.)
The commission concluded: "Dina Nath Pandey was a member of the RSS, his actions followed a line which was in fulfilment of the general scheme of the Hindu communalists of Jamshedpur, and they were also aimed at achieving the plan announced in the leaflet circulated by them. His conduct had thus directly contributed to the outbreak of the riot..."
Significantly, the commission said the riot was fomented to consolidate the political objectives of the Jan Sangh, forerunner of the BJP. On Pages 103-104, its report makes a detailed analysis of the "true intentions" of the Jan Sangh in the context of the collapse of the Janata Party and emergence of the BJP.
The commission concluded: "...the RSS played their role in this matter, motivated by the long-term political objective of gaining strength for their political wing, simultaneously with propagating their doctrine..."
Jamshedpur, April 1979
Toll: 108 (Muslims: 79; Hindus: 25)
Probe: The Jitendra Narain Commission of Inquiry
(Courtesy: The Hindustan Times, March 12, 2000)
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Saturday, November 22, 2008
लौटना मार्क्स का (Lautna Marx Ka)
इधर एक शोर बरपा है। दाढ़ी खुजलाते, बाल झटकते, बोलते-बोलते टेढ़े होते बदन, हमेशा तनाव से खींचे रहने वाले चेहरों पर चमक दिख रही है। कार्ल मार्क्स लौट रहे हैं। दास कैपिटल यानी पूँजी की तलाश फिर शुरू हुई है। गोष्ठियों में कहा जा रहा है, ‘देखा आ गई ना मार्क्स की याद। मार्क्स ही इस दुनिया को बचाने वाले हैं।’ कार्ल मार्क्स न लौट रहे हों जसे कल्कि अवतार हो रहा हो। जसे कोई आस्थावान कह रहा हो, देखो हम कहा करते थे ना, दुनिया को बचाने भगवान, कल्कि अवतार का रूप लेंगे। वो आ गए। वो आ गए...।
पिछले कई सालों से वचारिक रूप से पस्त चल रहे ‘ऑफिशियल मार्क्सवादियों’ में विश्व आर्थिक मंदी ने थोड़ी हरकत पैदा कर दी है। पँख फड़ फड़ाकर वे धूल झाड़ रहे हैं। खबरें पढ़कर खुश हो रहे हैं। कोने में छप रही -‘मार्क्स की याद आई’ या ‘तलाशी जा रही है मार्क्स की पूँजी’ जसी खबरें उन्हें खुशी से झुमा रही है। याद अमेरिका, यूरोप और दूसरों को आ रही है, खुश ये हो रहे हैं। दूसरों की खुशी में अपनी खुशी तलाशना अच्छी बात है। लेकिन यह खुशी, इस मुल्क में न तो मार्क्सवाद का झंडा बुलंद कर पाएगी और न ही समाजवाद ला पाएगी। उसके लिए तो इसी माटी में मार्क्सवाद और ‘पूँजी’ की जड़ें जमानी होंगी।
ऐसा कहा जाता है और है भी, ‘मार्क्सवाद एक वैज्ञानिक विचारधारा है’- तो विज्ञान कब मरा था, जिसके दोबारा जीने की बारी आ गई। विज्ञान तो लगातार आगे की ओर बढ़ता रहता है। फिसलता है, फिर आगे ही बढ़ता है। तजुर्बे में नाकामी भी मिलती है लेकिन तजुर्बे का जज्बा कम नहीं होता। वरना कल्पना चावला के मारे जाने के बाद, सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष का रुख करने का हिम्मत नहीं कर पातीं। विज्ञान का इस्तेमाल कौन कैसे करेगा, यह उसकी जमीनी हकीकत और जरूरत के मुताबिक तय होगा। भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान ने भी चाँद पर झंडा लहराने से पहले देश की जरूरत पूरी की। अंतरिक्ष विज्ञान का भारतीय इस्तेमाल।
लेकिन भारत में मार्क्सवादियों के साथ क्या हुआ? वह अंतरराष्ट्रीयता का झंडा बुलंद करते रहे क्योंकि कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो कहता है, दुनिया के मजदूरों एक हो। दुनिया में मार्क्सवाद का कोई एक रूप नहीं है। विचारकों ने अपने-अपने मुल्क और जरूरत के हिसाब से मार्क्सवाद की व्याख्या की। यूरोप का मार्क्सवाद वही नहीं है, जो चीन का है और सोवियत संघ का था। या फिर क्यूबा, वियतनाम या उत्तर कोरिया का है। यहाँ तक कि ह्यूगो शावेज और लूला डीसिल्वा ने अपनी अलग पहचान बना ली। लेकिन क्या इतने बड़े मुल्क में ‘भारतीय मार्क्सवाद’ नाम की कोई चीज उभर पाई।
सोवियत संघ के समाजवाद का पर्दा गिरता है तो यहाँ का ‘ऑफिशियल कम्युनिस्ट आंदोलन’ पहचान के संकट से जूझने लगता है। चीन में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होता है तो यहाँ ‘लाइन लेने’ का संकट पैदा हो जता है। खेमों में बँटे विश्व मार्क्सवाद में भारतीय कम्युनिस्ट, इस या उस खेमे में ही बँटे रहे। दूसरों की ही लकीर पीटते रहे। न तो कोई ‘भारतीय मार्क्सवाद’ बनाया और न ही कोई लाइन रखी। ऐसा नहीं है कि फतवे सिर्फ मौलाना देते हैं। यहाँ भी कम बड़े फतवेबाज नहीं हैं। किसी ने जरा सा भी नई लाइन खींचनी शुरू की, वे ‘संशोधनवादी’ हो गए। बुर्जुवा, प्रतिक्रियावादी और प्रतिगामी करार दे दिए गए। मक्खी की तरह निकाल फेंके गए। कहाँ गए, पता तक नहीं चला। यहाँ सत्ता नहीं थी, वरना यहाँ भी बेरिया और साइबेरिया दोनों होते। मार्क्सवाद को धर्म की तरह ओढ़ने और ताबीज की तरह पहनने पर ऐसे ही होगा।
दुनिया को समझने और बदलने के लिए मार्क्सवाद, आज ज्यादा जरूरी विचार है। लेकिन इसके साथ और भी दूसरे विचारों का तालमेल जरूरी है। शब्दावली में कहें, तो ‘भौतिक परिस्थितियाँ’ समाजवादी आंदोलन के लिए जितनी आज माकूल हैं, उतनी हाल के दिनों में कभी नहीं रहीं। दुनिया की हालत। विश्व अर्थव्यवस्था में पस्त पूँजीवाद। देश में जगह-जगह असंतोष। देश के अंदर आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण की ‘हेजीमनी’ (वर्चस्व) का टूटना। इसके बावजूद कहाँ कौन सा देशव्यापी आंदोलन, जमीन पर या वैचारिक स्तर पर चल रहा है। कहाँ है वो वचारिक आंदोलन, जिसे हिन्दुस्तानी कहा जाए। छोटे-छोटे आंदोलन जरूर चल रहे हैं। लेकिन उनकी धुरी कहाँ है? नेपाल की माटी से उनका खास मार्क्सवाद निकल सकता है तो यहाँ क्यों नहीं। पर उसके लिए मार्क्सवाद को वैज्ञानिक तरीके से फिर पढ़ना और समझना होगा। नया वक्त, नई शब्दावली की माँग कर रहा है। नए लोगों को शामिल करने की माँग कर रहा है। वर्ग से इतर दूसरी पहचान को मानने की माँग कर रहा है। आज का मार्क्सवाद इनक्लूसिव होगा- इसमें महिलाएँ, दलित-आदिवासी, मुसलमान, पर्यावरणवादी, सब अपनी पहचान और मुद्दे के साथ शामिल होंगे। तब ही यह कामयाब होगा। शायद यही वजह है कि दुनिया फिर इस विचार को नए सिरे से समझना चाह रही है।
(‘हिन्दुस्तान’ में 16 नवम्बर 2008 को 'अड्डा' कॉलम में प्रकाशित)
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Monday, November 17, 2008
अजगर तो छदम धर्मनिरपेक्षतावादी निकला!
मोहब्बत की बात करते- करते अजगर ने यह क्या लिख डाला। यह भी छदम धर्मनिरपेक्षतावादी ही निकला। शायद यह अजगर होते ही ऐसे हैं। तब ही तो इसने अपना नाम ही रखा है, आस्तीन का अजगर। तीन दिन पहले उसने एक पोस्ट डाली अपने ब्लॉग 'अखाड़े का उदास मुदगर' पर।
वही पोस्ट यहाँ दोबारा पेश कर रहा हूँ। कॉपी- पेस्ट लेकिन बिना किसी साभार के। यह आस्तीन का अजगर कौन है। है भी या नही। कहीं वर्चुअल वर्ल्ड का यह वर्चुअल क्रिएशन तो नहीं। दिखता है पर होता नहीं। क्या करता है। क्या खाता है। किस बिल में रहता है। जब यह मालूम नहीं तो साभार हवा में कैसे दे दिया जाए।
अजगर की इन लाइनों को पढ़कर लगता है, अजगर इन दिनों बेचैन है। उसके बदन में ऐंठन हो रही है। लगता है गला दबोचने वाले अजगर के गले पर किसी तरह का फंदा है। और वह फंदे से आजाद होने की कोशिश में है। खैर मेरा भाषण पढ़ने के बजाय, जिन दोस्तो ने अब तक आस्तीन का अजगर की ये लाइन नहीं पढ़ी है, जरूर पढ़ें और देखें अजगर ने जब पूंछ उठाई तो वह भी छदम धर्मनिरपेक्षतावादी ही निकला। सो, सावधान।
नासिरूद्दीन
बहुमत की लठैती वाले लोकतंत्र में आस्थाएं मरी जा रही हैं आहत होने के लिए
एक पूर्व गृहमंत्री अब प्रधानमंत्री बनना चाहता है. वह कह रहा है कि मालेगांव धमाके में जो आरोपी हैं, अगर वे दोषी हैं, तो उनपर कानून अपनी कार्रवाई करे.. ये वह आदमी कह रहा है, जिसने पूरे मुल्क में रथ यात्रा कर पहले दंगे करवाए, फिर बाबरी मस्जिद तुड़वाई, जिन्ना को गांधी के बराबर बताने की कोशिश की..वह कह रहा है वह ईसाई स्कूलों में पढ़ा है, उसे अच्छा नहीं लगता जब ईसाइयों का हिंदुस्तान में कत्लेआम होता है. और नन का बलात्कार. और एक कारगिल के बहादुर सिपाही मोतीलाल प्रधान के घर परिवार की तबाही. बात वहां तक नहीं पंहुचती. बीच में ही आई गई हो जाती है.
लालकृष्ण आडवाणी की भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष महोदय की तस्वीर उस साध्वी के साथ है, जिसका नाम मालेगांव धमाकों में बतौर प्रमुख अभियुक्त है. राजनाथ सिंह कह रहे हैं मासूम साध्वी प्रज्ञा को फंसाया जा रहा है. प्रज्ञा की ब्यूटीशियन बहन को मिलने नहीं दिया जा रहा है उस साध्वी से, जिसके फोटो की पूजा उसके जैविक पिता अपने पूजाघर में कर रहे हैं. पूजाघर में जो फोटो है, क्या उसमें वह मोटरसाइकिल भी है, जिस पर सवारी गांठकर प्रज्ञा घूमा करती थी और जिसका इस्तेमाल बम विस्फोट में किया गया.
इस तरह के चरित्र प्रमाणपत्र योगा मास्टर रामदेव भी दे रहे हैं, जिनकी चमत्कारी और शुद्ध और मंहगी आयुर्वेदिक औषधियों में इंसानी हड्डियों के होने का आरोप लगा था, जिसका खंडन तो उन्होंने किया था, पर ऐसी कोई कैमिकल एनालिसिस रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई. एक हिमानी सावरकर हैं, जो खुद को वीर सावरकर के भाई की बहू बताती है, जो साध्वी और दूसरे आरोपियों के लिए कानूनी मदद जुटा रही हैं. वे ये नहीं बताती कि वे नाथूराम गोड़से की भतीजी और गांधी हत्या के दूसरे आरोपी गोपाल गोड़से की बेटी भी हैं. हिमानी सावरकरजिस अभिनव भारत की कल्पना को साकार करने में लगी हैं, राजनाथ सिंह उसकी तस्वीर का हिस्सा हैं. आडवाणी जी की मज़बूरी है कि प्रधानमंत्री बनने का उनके पास ये आखिरी मौका है. इसलिए अब वे पार्टी निर्माण, और राष्ट्र निर्माण जैसी बेकार की बातों में समय न गंवाते हुए सिर्फ पीएम की कुर्सी की तरफ फोकस कर रहे हैं. उन्होंने अपनी एक हिंदी वेबसाइट भी शुरू की है, जिसमें उस भाषा को लेकर उनका प्रेम छलकता है, जिसे वे अपने जबड़ों से चबाते हुए कहते हैं. हिंदी वह जुबान है, जिसे जबड़ों से चबाते हुए आडवाणी और उनके चपाटियों ने नफरत फैलाई है. (अगर वे देवभाषा संस्कृत में अपनी नफरत पेलते, तो शायद इस नागरिक समाज का इतना बुरा न होता, जितना आज है.) उनकी जिंदगी एक नाखुश आदमी के संघर्ष में निकली है. उन्होंने पार्टी को किस गर्त से किन ऊंचाइयों तक पंहुचाया. त्याग किया. बलिदान किया. तकलीफ सहीं. अरमानों पर पत्थर रखे. और अब जब लास्ट चांस है, तो चांस कैसे लिया जा सकता है.
इसलिए वे हिंदुस्तान की सरहद पर लड़ रहे मुस्लिम पैरामिलीटरी सिपाही के लिए कुछ नहीं कहते, जिसे धुले में बताया गया कि तुम्हें और तुम्हारे कुनबे को बख्शने के लिए ये वजह काफी नहीं. तुम्हें इस लिए मारा जा रहा है कि तुम मुसलमान हो. एक ईसाई सिपाही का मकान कंधमाल में जला दिया गया औरउसे अपने पैरालिटिक भाई की अस्थियां दफनाने के लिए हत्या के ४५ मिनट बाद १० मिनट का समय दिया गया. कहा सुरक्षा नहीं दी जा सकती. उसका परिवार एक शरणार्थी शिविर में है. उसके पक्ष में कोई खड़ा नहीं होता. पर एक फौजी अफसर जिसका नाम हिंदू जेहादियों में लिया जा रहा है, उसे अदालत के कठघरे में खड़ा किये जाने पर भी ऐतराज किया जा रहा है. यह देश हिंदू आस्थाओं का देश है. इस देश में हिंदुओं के अलावा किसी भी और संप्रदाय के लोगों की जानमाल की गारंटी लेने वाला कोई नहीं है, ऐसा दो बातों से पता चलता है- एक जो उन पर हमला करते हैं. दूसरा जिन्हें इस मुल्क के संविधान ने उन लोगों को बचाने का काम सौंपा था. यानी मुख्यमंत्री, खुद को सैक्यूलर कहने वाली पार्टियां, पुलिस और प्रशासन.
मुंबई में राज ठाकरे की आस्था आहत है और कांग्रेस सरकार अपनी टांगों में दुम दिये बैठी है. 93 साल का मकबूल फिदा हुसैन अदालत के फैसले के बाद भीहिंदुस्तान नहीं लौट रहे, क्योंकि उसे बाल ठाकरे की गारंटी चाहिये, आडवाणी का क्षमादान (देखिये आइंदा हमारी देवियों को बिना ब्रा-पैंटी- ब्लाउज- साड़ी के आप पेंट नहीं करेंगे... अदालतें जो भी कह रही हों, आपको पता है न हम आपका क्या हाल कर देंगे मकबूल जी) चाहिए, राज ठाकरे का प्रोटेक्शन चाहिए. 93 साल का एक बूढ़ा भारतीय जो पद्मविभूषण है, वह उन हिंदू आस्थाओं का दुश्मन है, जो इस्लामिक जेहादियों के तेवर अपना चुकी हैं. अगर मकबूल फिदा हुसैन हिंदू देवी देवताओं को नंगा दिखाकर असम्मान करते हैं, तो खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों और अजंता के चित्रों को यह देश अपने विरासत में क्यों गिन रहा है. वे कामसूत्र और वात्साययन पर शर्मिंदा क्यों नहीं हैं और उनपर प्रतिबंध क्यों नहीं लगातीं. करोड़ों हिंदू औरतें सांपों के बीच शिव के लिंग को दूध चढ़ा रहीं है एक अच्छे से पति के लिए, पर इसमें कोई असम्मान, अश्लीलता का सवाल नहीं है. (अच्छा पति नहीं मिलने पर भी उनकी आस्था आहत नहीं होती..) वे ताज़ महल को हिंदू मंदिर बताने वाले थ्योरिस्ट की बात को मानते हुए वहां भजन कीर्तन और शाखा क्यों नहीं शुरू करवा देती. यह देश तस्लीमा नसरीन को सुरक्षा, शरण, घर सब दे सकता है, मकबूल फिदा हुसैन को नहीं. तस्लीमा की अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा भी जरूरी है, पर हुसैन को ठीक करना जरूरी है.
सिलेक्टिव आस्थाओं का दौर है. और आस्थाएं आहत होने के लिए कमबख्त मरी जा रही है. और आस्था किसी भी बात से आहत हो सकती है. बहुसंख्य की आस्था लठैती हो गई है. लोकतंत्र में बहुमत मायने रखता है. लोकतंत्र में अल्पमत मायने नहीं रखता, ये नई सीख है. और वह सब पर लागू होती है. चाहे वह सरहद को बचाने वाला हो, या फिर कोई और. अगर हिंदू नहीं है, तो मर सकता है. कई बार जान बूझ कर, कई बार गलती से, कई बार तैश में, कई बार आस्थाएं आहत होने पर, कई बार सिर्फ इसलिए कि एक ईसाई नन या बिलकीस बानो का बलात्कार करने से हिंदूत्व का झंडा थोड़ा और ऊंचा हो जाता है. इस ऊंचे झंडे के बूते आडवाणी और उनके लोग इस मुल्क पर राज करना चाहते हैं. एक बार और. बस एक बार. उनमें ऐसा क्या खास है, जो मुझमें नहीं.
जब ये सब हो रहा होता है, तो नवीन पटनायक और विलास राव देशमुख और डॉ मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल जो बोलते हैं उसमें से बेचारगी की ऐसी आवाज़ निकलती है- चूंचूंचूंचूंचूं.. कहीं ऐसा न हो कि जो मुंह में दही जमाकर बैठे हों, उसमें ख़ल़ल पड़ जाए. जैसे सरकार चलाने की जगह उन्हें भंडैती करने का जनादेश मिला हो. वे पता नहीं किस ख़ौफ में सबकी नाफरमानी कर रहे हैं- संविधान की, जनादेश की, अदालतों की, इंसानियत के तकाजे की. लोग तो ये शरीफ लगते हैं, पर वे हमेशा कम्प्रोमाइजिंग पोजिशन में क्यों पाये जाते हैं. इन शरीफ और पनीले लोगों के कारण समाज में शराफत से रहना ही मुश्किल हो गया है.
अब ये मसला कानून और व्यवस्था का नहीं है. आस्था का है. आस्था कुछ भी करवा सकती है. कत्ल, ब्लात्कार, बम विस्फोट..
लोकतंत्र, संविधान, गणतंत्र, मानव अधिकार खुशी से तेल लेने जा सकते हैं.
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Thursday, October 23, 2008
आतंकवाद का हिन्दुत्ववादी (हिन्दू नहीं) चेहरा (Hindutava terror)
क्या वाकई हम सब, पुलिस और खुफिया निजाम आतंकवाद से लड़ना चाहते हैं। अगर हाँ, तो वक्त आ गया है कि आँख में आँख डालकर सच कहने और सुनने की हिम्मत पैदा करें। पिछले कई पोस्ट में ढाई आखर से यह मुद्दा उठता रहा है कि आतंकवाद को किसी खास मजहब या खास समुदाय या खास नामधारियों के मत्थे मढ़ने से काम नहीं चलेगा। इससे आतंकवाद खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन जब पूरा का पूरा निजाम, खासतौर पर पुलिस और खुफिया एजेंसियाँ और उनकों वैचारिक खाद-पानी देतीं, हिन्दुत्ववादी पार्टियाँ (हिन्दूवादी नहीं) हों तो हर जाँच एक खास चश्मे से ही की जाएगी।
इसी मायने में इंडियन एक्सप्रेस की आज की एक खबर हंगामा मचाए है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ईद के ठीक पहले मालेगाँव और मोदासा में हूए बम धमाकों में हिन्दुत्ववादी संगठनों के हाथ होने की खबर है।
खबर कहती है कि इंदौर के एक हिन्दुत्ववादी संगठन हिन्दू जागरण मंच इन धमाकों के पीछे है। धमाका करने वालों का रिश्ता अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से है। इसके कई कार्यकर्ताओं से पूछताछ की जा रही है। (खबर पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक करें।)
हमेशा की तरह धमाकों के तुरंत बाद पुलिस सूत्रों और खबरिया बंधुओं ने कहा था कि इन धमाकों के पीछे इंडियन मुजाहिदीन और सिमी का हाथ है। लेकिन तफ्तीश के जरिए अब कुछ और ही बात सामने आ रही है।
इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस ने ही एक खबर ब्रेक की थी कि जिसमें उसने सनातन संस्था और हिन्दु जागृति समिति के बारे में विस्तार से बताया था और इन संगठनों के आतंकवादी गतिविधियों के बारे में जानकारी दी थी। (इसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं- Quietly, hardline Hindu outfits build a network across Maharashtra, Goa. )
अब तो मुद्दा है कि हिन्दुत्ववादी विचारधारा (दोहरा रहा हूँ, हिन्दू धर्म नहीं। हिन्दू नहीं।) जिसकी जड़ें सावरकर से होते हुए हिटलर से मिलती हैं, क्या उसे इस मुल्क में इसी तरह फलने फूलने दिया जाएगा? क्योंकि जनाब जब इसे सीचेंगे तो प्रेम के बेल नहीं निकलेंगे। यहाँ तो नफरत की ही खेती होती है। कंधमाल, कर्नाटक और सन 2002 में गुजरात में जो हुआ, वह इसी राष्ट्रवादी, हिन्दुत्ववादी (हिन्दू नहीं) विचारधारा की बेल के फल और फूल है। तय कर लें कि क्या चाहिए। इसी से जुड़ा सवाल है कि आतंकी और आतंकवादी संगठन कौन है और उनके खिलाफ कैसी कार्रवाई की जानी चाहिए।
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Thursday, October 9, 2008
भारतीय मुसलमानों का अलगाव (Alienation Of Indian Muslims)
यह लेख जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, दिल्ली के कुलपति प्रोफेसर मुशीरूल हसन का लिखा है। इसे यहाँ अंग्रेजी में ही पेश किया जा रहा है। जामिया मीलिया, भारतीय धर्मनिरपेक्षता की सबसे मजबूत कडि़यों में से एक है। लेकिन बटला हाउस इनकाउंटर के बाद जामिया और मुशीरुल दोनों पर 'तथाकथित राष्ट्रवादी' लगातार हमले कर रहे हैं। इनके सुर में सुर मिलाया 'निष्पक्षता' के अलमबरदार मीडिया ने। मुशीरुल की यह टिप्पणी उसी संदर्भ में है। मुशीरुल हसन के बारे में कोई भी टिप्पणी करने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि उनके नाम से उनकी शख्सियत की 'पहचान' नहीं है। मुशीरल हसन देश के उन-गिने चुने लोगों में से थे, जिन्होंने सलमान रुश्दी की पुस्तक पर पाबंदी लगाए जाने पर सवाल खड़े किए थे। वह इस मुल्क के बड़े इतिहासकार हैं। यह टिप्पणी काउंटरकरंट्स से साभार यहाँ पेश की जा रही है।
Alienation Of Indian Muslims
By Mushirul Hasan
The extent to which the Indian society is getting polarised along religious lines is very disturbing. If this is the state of affairs almost seven decades after independence, what might happen a few decades later? This is not the time to attribute responsibility to different parties or communities. This is a moment for self-reflection and for finding out what gives rise to this mindless violence.
The other very disquieting fact is how the electronic media and sections of the Hindi print media have taken upon themselves the responsibility of being the custodian of the nation’s interest. The arrogance and intolerance in their coverage reflects a very ominous trend in the history of journalism. I have experienced this recently. The Jamia encounter in New Delhi was not a big affair, it could have been easily sorted out, but it was turned into a campaign against a university. Students of the Jamia Millia Islamia University were arrested without charge, they were denied access to lawyers and even their parents could not meet them. On top of it the university was blamed and its reputation was attacked. A student of the London School of Economics (LSE) was nabbed very recently by the police — does it mean that the LSE has become a hotbed of terrorism? This is senseless.
The university’s doors are open to non-Muslims; it’s teachers are drawn from all communities. Compare our record with that of other so-called secular universities where Muslims have limited access — Benaras Hindu University, Allahabad University and even Delhi University — then what are we questioning?
I think we have to fight back. We have tolerated this nonsense for far too long. We demonstrate to the people that the media are not trustworthy and that they only sensationalize events. Jamia Millia is a secular institution funded by the Central Government. The question of legal aid is not being looked at from the perspective of a teacher’s responsibility to her students. As the head of the institution, I feel I have an obligation towards my students and I am not using the taxpayer’s money for it. The real issue is of principle. If this had happened to a non-Muslim student, I would have done the same. I am also upholding the rule of law. Why have we forgotten the principle that says that an accused is innocent until proven guilty?
In the ultimate analysis, our society, which has gone through the Khalistan movement and experienced terrorism in the Northeast, must look at these incidents in a more cool-headed manner. You can’t fight it by reacting in a hysterical manner. Our police is becoming more and more politicized and communalized. We haven’t oriented them into becoming the custodians of the secular values enshrined in our constitution. Over the past 10 years, there has been a systematic pattern — Deoband University, an institution with a glorious record, has been targeted. So has Nadvat-ul-Ulema in Lucknow. Attacking the Aligarh University is not new, despite it being a modern institution with its doors open to students of all communities. Is there a pattern in this madness? We need to reflect on these issues. The alienation is very deep and it has to stop. Instead of supporting us, which would also mean supporting an institution committed to secular values, there are attempts to undermine our secular foundations.
We are dealing with a younger generation of Muslims. I believe in liberal, eclectic and pluralist values, but I suspect this vision will not be shared by those who feel insecure and excluded, socially and culturally. Why have the guilty in Gujarat not been punished? Why? Why? Why? Why is the VHP and Bajrang Dal not banned for killing innocent Christians and desecrating their churches?
I regard myself, as do millions of others, as part of the edifice that is called India. The idea of India is my idea. There is no India without me and I will not let that change. We have already taken certain steps to counter subversive ideas that might fracture our secular society. I appeal to civil society and the media to let us live in peace and get on with our simple and innocent job i.e. pursuit of knowledge. There is a limit to what one can tolerate. Nobody dare question our commitment to education, and our loyalty to the Indian Constitution.
– Hasan is Vice-Chancellor of Jamia Millia Islamia, New Delhi, India
(Courtesy- www.countercurrents.org)
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Saturday, October 4, 2008
एक पागल की डायरी का पुनर्पाठ
लू शुन की कहानी 'एक पागल की डायरी' का पुनर्पाठ अपूर्वानन्द के शब्दों में-
पचीस वर्ष हो गए हैं जब हमने पटना इप्टा की ओर से चीनी लेखक लू शुन की कहानी ' एक पागल की डायरी' का मंचन किया था. जावेद अख्तर खान ने मुख्य भूमिका निभाई थी. ज़ोर देने पर भी याद नहीं आ रहा कि तब क्यों हमने इस कहानी को मंचित करने के बारे में सोचा था.
इन पचीस बरसों में यह कहानी दिमाग की दराज में पड़ी रही. कहानी के आखरी दो वाक्य जैसे एक मन्त्र की स्मृति की तरह रक्त में घुल गए : "शायद बच्चों ने आदमी को नहीं खाया है? बच्चों को बचा लें... ." एक विक्षिप्त हो गए मनुष्य की कातर, आर्त पुकार है. नफरत के निरंतर प्रचार के बीच लगभग नब्बे साल पहले चीन से उठी यह चीख मेरे मस्तिष्क के आकाश में मंडराती रही है.
कथा का वाचक अपने स्कूल के दो दोस्तों से कई साल बाद मिलने जाता है. उसे उनमें से एक के बीमार रहने कि ख़बर मिली थी. उनके घर जाने पर बड़ा भाई बताता है कि छोटा भाई अभी-अभी बीमारी से उबरा है और कोई सरकारी नौकरी उसे मिल गई है. फिर वह वाचक को अपने छोटे भाई की बीमारी के दौर में लिखी गई डायरी की दो जिल्दें देता है और कहता है कि इन्हें पढ़ने से शायद उसकी बीमारी के बारे में कुछ मालूम पड़ सकेगा. वाचक को डायरी पढ़ कर लगता है कि उसका दोस्त एक प्रकार के पर्सिक्युशन कॉम्प्लेक्स से पीड़ित था. फिर वह इसे समझने के ख्याल से डायरी के कुछ हिस्सों कि नक़ल पह करता है.
मैं जब भद्र वर्ग के पुरुषों और महिलाओं के बीच बैठा गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम या उड़ीसा में ईसाइयों के मारे और बरबाद किए जाने के पीछे उन समुदायों की बदमाशी को ही कारण की तरह प्रस्तुत किए जाते सुनता हूँ तो मुझे फिर यह कहानी याद आने लगती है. मुझे उन्नीस सौ तिरासी-चौरासी के दिन याद आते हैं जब पंजाब में सिखों के बड़ी तादाद में गायब किए जाने और मार दिए जाने के पक्ष में भी ऐसे ही तर्क दिए जाते थे.
पटना में सिखों को लूटा गया तो यही तर्क दिया गया था की कभी भी उन्होंने क्यों नहीं सिख आतंकवाद का मुखर विरोध किया . जैसे यह कितना अकाट्य तर्क हो किसी को मार दिए जाने के पक्ष में. मुझे पटना के हर मन्दिर साहब में शरण लिए सिख याद आते हैं जो अपने पड़ोसी हिन्दुओं से डर कर वहाँ छिपे बैठे थे जो उनका खून पी लेना चाहते थे.
अभी चार रोज़ पहले एक बैठक में एक दोस्त बताने लगीं कि उनकी बच्ची उनसे यह पूछ रही थी कि क्या ऐसे दिन आने वाले है जब उसे भी वैसे ही छुप कर रहना पडेगा जैसे नाजियों के ज़माने में एन फ्रैंक को रहना पड़ा था. हमारे एक दोस्त ने कहा की यह अतिरंजित भय की अभिव्यक्ति है, अभी हमारे हालत ऐसे नहीं हुए है. हमारे एक दोस्त ने कहा की वह बेहद डर गया है और उसे ऐसा लगने लगा है कि कोई उसके पीछे आ आ रहा है , उसे घेरने आ रहा है. वह दूसरों को ढांढस बंधाता रहा है . क्या यब कुछ उसी पर्सिक्युशन कॉम्प्लेक्स के लक्षण हैं जिससे एक पागाल की डायरी का वह पात्र ग्रस्त था?
" आज आसमान में चाँद है ही नहीं, और मैं जानता हूँ कि यह अपशगुन है. आज सुबह मैं बड़ी सावधानी से बाहर निकला. मिस्टर झाओ बड़ी अजीब निगाहों से मुझे देख रहे थे मानो मुझसे डरे हुए हों, जैसे मुझे मार डालना चाहते हों. सात-आठ और थे जो फुसफुसा कर मेरे बारे ही बात कर रहे थे. और वे इससे भी डरे हुए थे कि मैं उन्हें देख रहा था. मैं जितने लोगों के करीब से गुजरा वे सब इसी तरह घबराए हुए थे. उनमें जो सबसे खौफनाक था, उसने मुझ पर दांत निपोड़े. इससे एड़ी से चोटी तक मैं सिहर उठा क्योंकि मुझे मालूम था कि उनकी तैय्यारी पूरी थी."
''मैं हलाँकि डरा नहीं और बढ़ता ही चला गया. मेरे सामने बच्चों का एक झुंड था जो मेरे बारे में ही बात कर रहे थे और उनकी आँखों में भी मिस्टर झाओ जैसे ही भावः थे. मैं सोचने लगा कि आख़िर इन बच्चों को मुझसे क्या शिकायत रही होगी कि वे ऐसा बर्ताव कर रहे है ! ...मुझे मालूम नहीं कि मिस्टर झाओ को या सड़क के इन लोगों को मुझसे क्या शिकायत है. मुझे कुछ भी याद नहीं आता सिवाय इसके कि बीस साल पहले मेरे पाँव मिस्टर गू जियु के बही खतों पर पड़ गए थे और वे बेहद नाराज़ हुए थे. हालांकि मिस्टर झाओ उन्हें नहीं जानते लेकिन हो सकता है उन्होंने कहीं इसके बारे में सुन रखा हो और इसका बदला मुझसे लेना तय किया हो. शायद इसलिये वे सड़क के इन लोगों के साथ मिल कर मेरे ख़िलाफ़ साजिश कर रहे हैं. लेकिन इन बच्चों का क्या? उस वक्त तो ये पैदा भी नहीं हुए थे, फिर ये मुझे आज इतनी अजीब निगाहों से क्यों देख रहे हैं जैसे कि मुझसे डरे हर हों और जैसे मुझे मार डालना चाहते हों ? ...मुझे पता है. उन्होंने यह सब कुछ ज़रूर अपने माँ बाप एस सुन रखा होगा!"
पागल की डायरी का पागल ऐसा महसूस करने लगता है कि वह चारों ओर से ऐसे लोगों से घिर गया है जिन्हें आदमी का मांस खाने की आदत पड़ गई है. वह लिखता है कि उसके गाँव से कोई आया था जो यह बता रहा था कि किस तरह गाँव के लोगों ने एक बदमाश को पीट-पीट कर मार डाला और फिर कुछ लोगों ने उसका जिगर निकाल कर तल कर खा डाला था. यह सुन कर जब वह अपने भाई और गाँव वाले को टोकता है तो वे उसे घूरने लगते है और उसे लगता है कि उनकी निगाहें भी सड़क के लोगों जैसी ही हैं. तो क्या उन्हें भी आदमी का मांस खाने की आदत है?
आगे वह लिखता है,
" मुझे उनका तरीका मालूम है: वे फौरन मार डालना नहीं चाहते, उन्हें इसका साहस भी नहीं क्योकि उन्हें इसका नतीजा पता है. इसकी जगह वे सब मिल गए हैं और उन्होंने हर जगह फंदा बिछा दिया है ताकि मुझे अपने आप को मार डालने पर मजबूर कर दें. कुछ दिन पहले सड़क के लोगों के बर्ताव और कुछ दिन से मेरे भाई के व्यवहार से भी यह साफ़ हो गया है. उन्हें सबसे सबसे पसंद है वह यह कि आदमी अपनी बेल्ट निकाल कर उसी से ख़ुद को लटका ले... ज़ाहिर है इसमें उन्हें बहुत मज़ा आता है और वे हँसते हँसते लोट-पोट हो जाते हैं."
"... वे सिर्फ़ मरा हुआ मांस खाते हैं..." आदमी का गोश्त खाने कि इच्छा , साथ ही यह डर कि कोई उन्हें भी खा जा सकता है, इस वजह से वे सब एक दूसरे को शक की निगाह से देखते रहते हैं... आगे वह लिखता है, "उनकी ज़िंदगी कितनी सुकून भरी होती गर वे ख़ुद को इस शक से आजाद कर पाते...
क्या डायरी लिखने वाला पागल है? वह लिखता है, " मुझे यह अहसास अब जा कर हो पाया है कि मैं ऐसी जगह रह रहा हूँ जहाँ चार हज़ार साल से आदमी का मांस खाया जाता रहा है....चार हज़ार साल के मनुष्य भक्षण के इतिहास के बाद मुझ जैसा व्यक्ति किसी वास्तविक मनुष्य का सामना कैसे कर पायेगा? " अपनी पीढ़ी की इस अक्षमता से निराश वह पागल अपनी डायरी इन वाक्यों पर ख़त्म करता है, "शायद अभी भी बच्चों ने आदमी का मांस नहीं खाया हो? बच्चों को बचा लें..."
दिल्ली, भागलपुर, नेल्ली, हाशिमपुरा, भिवंडी, ठाणे, आजमगढ़, जयपुर, इंदौर, धार, रतलाम, मंगलोर, कंधमाल के बाद क्या हममें इंसान का सामना करने की योग्यता शेष रह गई है? फिर हम क्या करें।
(अपूर्वानन्द दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाते हैं)
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Thursday, October 2, 2008
ईद के मौके पर गांधीगीरी
ऐसी न शब्बरात न बकरीद की खुशी,
जैसी है हर दिल में इस ईद की खुशी।।
नजीर अकबराबादी की ये दो लाइनें ईद की अहमियत बताने को काफी हैं। ईद से पहले एक महीना होता है- रमजान। रमजान यानी इबादत, संयम, विवेक, खुद पर काबू रखने की सलाहियत पैदा करना, अपनी बुराइयों पर विजय पाना, झंझावात में भी इंसानियत का जज्बा सम्हाल कर रखना, पडो़सियों का हक अदा करना, गरीबों की मदद करना, बेसहारों को सहारा देना... और ढेर सारे आदि-आदि। यानी उन सब की चीजों की याद दिलाना, जिससे इंसान, इंसान बना रहे। यही असली जिहाद भी है। सर्वश्रेष्ठ जिहाद।
लेकिन यह ईद कुछ अलग है। इस बार रमजान में बम विस्फोट, एनकाउंटर, तनाव, खौफ, नफरत के बोल, मीडिया के हर क्षण होते ब्रेकिंग न्यूज... हावी रहे। रोजदारों के सूखते गले, पपडि़यों पड़े काँपते होंठ और खोई- खोई आँखें ढेर सारे सवालों का जवाब खोजती रही। खुशी पर खौफ और नफरत का साया छाया रहा।
फिर भी ईद एक ऐसा त्योहार है जो आता ही इसीलिए है कि दूरियाँ कम हों, नफरत और खौफ का साया खत्म हो। गले यूँ ही थोड़े मिलते हैं। इसलिए बावजूद खौफ के खुशियों के नजारे कम नहीं हैं।
... और आज बापू का भी जन्म दिन है। ऐसे माहौल में बापू की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस हो रही है। गांधी जी से प्रेम करने वाले जितने लोग हैं, घृणा करने वाले भी कम न थे और न हैं। उसी घृणा ने गांधी जी की जान भी ली। लेकिन गांधी, महात्मा बने घृणा से नफरत करने... बदले में प्यार लुटाने की सीख देकर और इससे लड़ने के लिए अहिंसा का रास्ता दिखाकर। अमन का संदेश देकर। नफरतों के बीच दीवार बनकर। ... इसीलिए आज जब दिल्ली, मालेगाँव, साबरकांठा से लेकर उड़ीसा तक घृणा का माहौल बना जा रहा है और चारों ओर हिंसा ही हिंसा है, वैसे में बापू की सीख और उनके बताए रास्ते से बेहतर क्या हो सकता है।
तो आइए इस ईद की दुआ उस गांधी के नाम करें जिसने बुराई का जवाब बुराई से नहीं दिया, जिसने नफरत करना नहीं सिखाया, जिसने मजहब को नफरत का हथियार नहीं बनाया, जिसने हक के लिए लड़ने का अहिंसा का रास्ता दिखाया। जिसने हमेशा मजलूमों का साथ दिया। जिसने अमन के लिए जान की बाजी लगा दी। आमीन।
आइए हाथ उठाएँ क्योंकि यह दुआ कामयाब होगी तो गले भी मिलेंगे और दिल भी। और तब नजीर संग पूरा देश झूमेगा ईद की खुशी में। दुआ की कामयाबी के लिए दुआ कीजिए क्योंकि आने वाले दिन दुर्गा पूजा और दीवाली की रंग बिरंगी खुशियों से भरपूर हैं। उन पर किसी बद की नजर न लगे। ... अगर बापू की याद को रस्म अदायगी नहीं बनानी है ... तो अमन की यह दुआ करनी ही पड़ेगी।
मौका हो तो पिछली पोस्ट भी देखें
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Tuesday, September 30, 2008
सवाल उठाने की इजाजत चाहता हूँ
सवाल उठाने पर सवाल
पृथ्वी गोल है। सूरज पूरब से उगता है। गंगा नदी है। हिमालय पर्वत राज है- अगर इन प्राकृतिक सचाइयों को छोड़ दें तो सच वही नहीं होता जो अक्सर बताया या दिखाया जाता है। सच के भी कई रूप होते हैं। सच को हम अपने मुताबिक स्वीकार या इनकार करते हैं।
पिछले कुछ दिनों में सच की ढेर सारी शक्लें सामने आ रही हैं। ये शक्लें वैसी हैं, जिन्हें हम अपने मुताबिक ढालने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली में विस्फोट और कई बेगुनाहों की हत्या। विस्फोट करने वाले कथित लोगों का बटला हाउस में इनकाउंटर। फिर तफ्तीश का ब्रेकिंग न्यूज...
मैं मॉस कॉम का विद्यार्थी रहा हूँ। मॉस कॉम सिद्धांत और रिसर्च में मेरी दिलचस्पी है। मॉस कॉम का एक मूल और सामान्य सा सिद्धांत है जो सच की सचाई को बताती है। इसके मुताबिक सच का चेहरा कलम को पकड़ने वाले हाथ, टाइपराइटर या कम्प्यूटर पर चलने वाली उंगलियाँ, कैमरे के पीछे लगी आँखें और सबसे बढ़कर 'गेटकीपर' तय करते हैं। ( गेटकीपर यानी खबरें जिन आँखों से गुजरती और खबरों के होने न होने पर जिनका नियंत्रण होता है।) सच वही होता है, जो ये सभी बताते, लिखते, दिखाते या छापते हैं।
लोक जीवन में एक ही घटना के कई आख्यान हमें मिल जाएँगे। इसीलिए विद्वानों ने इतिहास को देखने का भी एक सब अलटर्न तरीका निकाला। यानी घटनाओं का वैकल्पिक आख्यान जो कथित रूप से आधिकारिक ब्योरे से इतर है। खबरों का भी ऐसा ही आख्यान है। जो दिखता है और जो छपता है, कई बार सच उससे इतर भी होता है। अक्सर एक ही खबर, दो अखबारों या चैनलों में बिल्कुल अलग तरीके से सामने आती है। ... लेकिन आतंकवाद एक ऐसी खबर है, जिसने पहली बार एक कॉमन दिमाग, कॉमन शत्रु, कॉमन जबान, कॉमन टारगेट बनाने में कामयाबी हासिल की है। यहाँ सवाल उठाने की इजाजत नहीं है। सवाल उठाने वाले दिमाग 'शत्रु' की श्रेणी में हैं। आँख बंद कर मान लेने वाला देशभक्त है। सवाल की गुंजाइश चाहने वाला 'आतंकियों का दोस्त'।
लेकिन सवाल तो उठेंगे क्योंकि सब कुछ ठीक नहीं है।
कुछ उदाहरण देखें-
(1) बम धमाकों की जितनी भी निंदा की जाए कम है। लेकिन बम धमाकों को सुलझाया कैसे गया। एक इनकाउंटर हुआ। दो कथित आरोपित मारे गए और एक पुलिस अधिकारी को जान गँवानी पड़ी। एक आरोपित पकड़ा गया, दो लोग भाग गए। ... कई दिनों तक इसी से जुड़ी खबरें मीडिया की सुख्रियाँ रहीं। न कोई शक, न कोई सवाल।... कुछ लोगों ने हिम्मत जुटाकर कुछ सवाल खड़े किए तो वे 'देशद्रोही' की श्रेणी में आ गए। यानी सच वही, जो बताया जाए और उस पर आँख बंद कर विश्वास कर लिया जाए। ... जब दिमाग का इस्तेमाल ही नहीं है तो फिर मनुष्य के रूप में जन्म क्यों। शायद इस पर भी सवाल नहीं है।
कुछ रिपोर्ट: माने या न माने पर सवाल की इजाजत तो दें
Fact finding team finds loopholes in Delhi encounter
Civil society team questions Batla House encounter
Batla House residents speak out
(2) दिल्ली पुलिस के मामला सुलझाने से पहले, यूपी और अहमदाबाद की पुलिस बम धमाकों को सुलझाने का दावा कर चुकी थी। ... यह तो सहज बुद्धि का मामला है कि जानकारी ली जाए कि अगर दिल्ली में पकड़े गए नौजवानों ने ही यूपी की कचहरियों, वाराणसी के संकटमोचन मंदिर, गोरखपुर के साथ ही साथ गुजरात और राजस्थान में धमाके किए तो जिन्हें पहले पकड़ा गया, वे कौन हैं।
(3) अब देखिए हमारा जीके कितना बढ़ाया जा रहा है। पहले पता चलता है कि यूपी में धमाके हूजी ने कराए। हूजी कौन है, क्या है किसी को पता नहीं। किसी ने बताया लादेन की तरह बड़ा शातिर दिमाग है। पाकिस्तान में बैठा है। तलाश किया गया तो पता चला यह एक संगठन का नाम है। जानकारी तो बढ़ी। खैर। इसके बाद जयपुर में भी हूजी था। अहमदाबाद में 'सिमी' हो गया। फिर गाड़ी घूमी, अब जयपुर में भी सिमी। फिर दिल्ली ने दावा किया, सब इंडियन मुजाहिदीन ने कराए। जाहिर है, राजधानी एक्स की रफ्तार सबसे अच्छी है तो अब सबकी गाड़ी इंडियन मुजाहिदीन की ओर है। और अब सब 'आईएम'। हर रोज ज्ञान बढ़ाता एक नया बम। इस 'सूचना विस्फोट' ने दिमाग के उस तंत्र पर सबसे ज्यादा असर डाला, जो हमें सवाल करने का द्रव देता है और जानवरों से बेहतर बनाता है।
(4) पुलिस के दावों के मुताबिक यूपी, जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली में विस्फोट करने वाले पकड़े गए। अच्छी बात है। गुनाहगारों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। ... लेकिन एक बात आज तक पता नहीं चली... किसी ब्रेकिंग न्यूज में भी नहीं आया... किसी सूत्र ने नहीं बताया और पुलिस की प्रेस कांफ्रेंस में भी सवाल नहीं उठे। आखिर यह धमाके अगर इन्हीं नौजवानों की कारस्तानी है तो इन्होंने यह किया क्यों। ... पैसे की खातिर... सम्मान की खातिर... ऐशो आराम के लिए... आखिर क्यों। चूँकि यह सवाल ही नहीं आया तो जाहिर है जवाब कहाँ तलाशा जाता।
(5) यूपी, जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली से पहले भी शायद कुछ और जगहों पर ब्लास्ट हुए थे। वहाँ भी बेगुनाहों लोगों की जानें गई थीं। जहाँ तक याद पड़ता है, मालेगाँव, हैदराबाद की मक्का मस्जिद, बम्बई में ट्रेनों में और बंगलुरू में भी विस्फोट हुए थे। अगर हाल के सारे धमाके दिल्ली वाले लड़कों ने किए हैं। तो ये सब धमाके किसने कराए। जरा इनके बारे में भी कुछ रोशनी डाली जाती तो कितना अच्छा रहता। पर सवाल...न...न ।
(6) हर साजिश के पर्दाफाश के साथ, एक मास्टरमाइंड पकड़ा जा रहा है। अब तक पता नहीं कितने मास्टरमाइंड पकड़े जा चुके हैं। इतने मास्टरमांइड और इन सबका पता धमाके के बाद चलता है, ऐसा कैसे। यही नहीं एक ही वारदात के कई मास्टरमाइंड। यह भी बड़ी अनोखी चीज है। और अगर मास्टरमाइंड गिरफ्त में हैं, प्रमुख लोग पकड़े जा चुके हैं तो फिर दिल्ली के मेहरौली, गुजरात के साबरकांठा और महाराष्ट्र के मालेगांव में धमाके कौन कर गया। और उसने रात का वक्त क्यों चुना। मेहरौली ब्लास्ट के बाद यह बताने की कोशिश हुई... कि इसमें बंग्लादेशियों का हाथ है। दुश्मन की पहचान इतनी तेज... कि यह नहीं तो वह, वह नहीं तो कोई और। यहाँ भी कोई सवाल नहीं।
(7) कल गुजरात के मदौसा और महाराष्ट्र के मालेगांव में ब्लास्ट के बाद दो चीज बताई गई। एक कि नवरात्र के पहले डराने के लिए यह आतंकी घटना है और दूसरी कि यह मामूली विस्फोट है। ... दो दिन बाद ईद है। रमजान में इफ्तार के बाद लोग बड़ी तादाद में शाम से लेकर देर रात तक खरीदारी करते हैं। यह बात कहाँ लोप हो गई। क्या किसी को ईद की याद भी थी। धमाके जिन इलाकों में हुए, वहाँ कौन रहते हैं। कौन मारे गए या घायल हुए। धमाका लो इंटेंसिटी का था, यह बताते जबान नहीं थक रही थी फिर ये सवाल कैसे छूट गए।
(8) कानपुर, नांदेड़ में बम बनाते मारे गए लोग कौन थे। इनकी तफ्तीश कहाँ तक पहुँची। यहाँ तो कुछ छिपा नहीं था। कितने हिरासत में लिए गए। कितनों के रिश्तेदार पकड़े गए। कितनों के साथी और सहयोगियों को पकड़ा गया। इनका भी कोई मास्टरमाइंड था या नहीं। मुम्बई या थाणे में बम फोड़ने वाले कौन थे। कौन थे, जिनके कमजोर बम बनाने पर ठाकरे साहब नाराज हो गए थे। आज तक कितने खबरिया माध्यम में ये सवाल आए... या ये सवाल उठाया गया कि ये धमाके किसी और संगठन की कार्रवाई भी हो सकती है। क्यों... क्योंकि यकीन है कि 'वे' ऐसा नहीं कर सकते। यह यकीन पुलिस को भी है और खबरिया बंधुओं को भी।
(9) इन्हीं सबके बीच एक और ऑपरेशन चल रहा है। एक महीने से ज्यादा हो गया, उड़ीसा में ईसाइयों पर हमले हो रहे हैं। गिरजाघरों को नष्ट किया जा रहा है। कइयों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। यह सब, एक स्वामी जी की हत्या के बाद शुरू हुआ। शक नक्सल संगठनों पर था। उन्होंने बाद में हत्या की जिम्मेदारी भी ली। लेकिन हत्या का बहाना बना कर ईसाइयों पर आज तक हमले जारी हैं। कर्नाटक में भी यही हो रहा है। आप खबर पढि़ए, तो आपको पता चलेगा किसी भीड़ या उपद्रवी ने यह किया है। भीड़ का कोई सांगठनिक चेहरा भी है या चेहरा विहीन है। हम उस भीड़ का नाम क्यों नहीं देना चाहते। और सबसे अहम है, यह सब हो क्यों रहा है। जान बख्शने की कीमत, धर्म परिवर्तन ही क्यों है।
(10) इसी बीच एक और सच भी आया। गोधरा कांड का सच। नानावटी आयोग ने जो बताया, उस पर ढेर सारे लोगों का यकीन नहीं है। एक अखबार ने तो यहाँ तक लिख दिया कि पार्ट वन में, पार्ट टू के बारे में फैसला दे दिया गया। एक सच फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी का है तो एक सच बनर्जी समिति का। और इन सबके बीच एक सच है, उन परिवारों का है, जिनके लोग मारे गए और जो मारने के इल्जाम में पकड़े गए हैं। अपना-अपना सच, और सच से जुदा। नानावटी के सच पर सवाल उठेगा या नहीं।
(11) सबसे बड़ा सवाल, कोई भी समुदाय, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, अपने अंदर पैठे कट्टरपंथी ताकतों को पहचान रहा है या नहीं। क्या वह ऐसे लोगों पर सवाल उठा रहा है, जो नफरत फैलाने के लिए किसी भी हद तक जाने से परहेज नहीं कर रहे। क्या कहीं से उन लोगों को दरकिनार करने की कोशिश हो रही है, जो दूसरे विश्वास, मजहब, विचार, मत, पंथ, जाति वालों को दुश्मन बनाकर पेश कर रहे हैं। उनके खात्मे में ही, अपनी जिंदगी देख रहे हैं। जो इस कीमत पर जिंदगी बख्श रहे हैं कि आप उन जैसे ही हो जाइए। क्या इस विश्वास पर कहीं सवाल उठाया जा रहा है कि नफरत फैलाने वाला या वाले 'हमारे' बीच के नहीं होते। वे तो 'उनके' बीच में हैं। हमारा न तो धर्म और न ही संस्कृति हिंसा को सहारा देती है। अगर सबका 'हमारा' ऐसा है तो हिंसा आ कहाँ से रही है। कम से कम यही सवाल उठे।
और अंत में, मेरी प्रोफेशनल नैतिकता सवाल उठाने पर टिकी है। क्योंकि जो जवाब निकलेगा, वह सच के काफी करीब होगा। अमृत भी बिना मंथन के कहाँ मिला था। मेरी व्यक्तिगत परवरिश और विचार सवाल उठाने पर जोर देते हैं, इसलिए कृपया मुझे कुछ सवाल उठाने की इजाजत मिलनी चाहिए। मुझे हाँ में हाँ मिलाने की आदत डालने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। हाँ, इन सवालों के एवज मुझसे मेरी देशभक्ति का सर्टिफिकेट भी न माँगा जाए।
क्या इन्हें भी पढ़ने का वक्त निकालेंगे
यह मुल्क हमारा होकर भी हमारा क्यों नहीं लगता
आंख बंद! दिमाग बंद!! सवाल कोई नहीं!!!
Posted by Nasiruddin 10 comments
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